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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६३
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वैशम्पाय़न उवाच
अद्यैव नक्षत्रमहश्च पुण्यं; यतामहे श्रेष्ठतमं क्रिय़ासु |  १५   क
अम्भोभिरद्येह वसाम राज; न्नुपोष्यतां चापि भवद्भिरद्य ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति