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शान्ति पर्व
अध्याय १५०
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नारद उवाच
एष चेष्टय़ते सम्यक्प्राणिनः सम्यगाय़तः |  ३०   क
असम्यगाय़तो भूय़श्चेष्टते विकृतो नृषु ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति