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शान्ति पर्व
अध्याय १२४
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धृतराष्ट्र उवाच
प्रह्रादस्त्वव्रवीद्विप्रं क्षणो नास्ति द्विजर्षभ |  २८   क
त्रैलोक्यराज्ये सक्तस्य ततो नोपदिशामि ते ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति