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वन पर्व
अध्याय १८६
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मार्कण्डेय़ उवाच
वहुशून्या जनपदा मृगव्यालावृता दिशः |  ३३   क
युगान्ते समनुप्राप्ते वृथा च व्रह्मचारिणः |  ३३   ख
भोवादिनस्तथा शूद्रा व्राह्मणाश्चार्यवादिनः ||  ३३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति