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कर्ण पर्व
अध्याय ५७
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कर्ण उवाच
शरार्चिषं गाण्डिवचारुमण्डलं; युगान्तसूर्यप्रतिमानतेजसम् |  ५५   क
न कौरवाः शेकुरुदीक्षितुं जय़ं; यथा रविं व्याधितचक्षुषो जनाः ||  ५५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति