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शल्य पर्व
अध्याय १८
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सञ्जय़ उवाच
रथाश्वद्विपहीनांस्तु तान्भीमो गदय़ा वली |  ४७   क
एकविंशतिसाहस्रान्पदातीनवपोथय़त् ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति