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वन पर्व
अध्याय ११६
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अकृतव्रण उवाच
अप्रतिद्वन्द्वतां युद्धे दीर्घमाय़ुश्च भारत |  १८   क
ददौ च सर्वान्कामांस्ताञ्जमदग्निर्महातपाः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति