वन पर्व  अध्याय ११६

अकृतव्रण उवाच

प्रमथ्य चाश्रमात्तस्माद्धोमधेन्वास्तदा वलात् |  २१   क
जहार वत्सं क्रोशन्त्या वभञ्ज च महाद्रुमान् ||  २१   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति