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वन पर्व
अध्याय ११६
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अकृतव्रण उवाच
आगताय़ च रामाय़ तदाचष्ट पिता स्वय़म् |  २२   क
गां च रोरूय़तीं दृष्ट्वा कोपो रामं समाविशत् ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति