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वन पर्व
अध्याय ११६
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अकृतव्रण उवाच
चिच्छेद निशितैर्भल्लैर्वाहून्परिघसंनिभान् |  २४   क
सहस्रसंमितान्राजन्प्रगृह्य रुचिरं धनुः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति