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द्रोण पर्व
अध्याय १५७
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धृतराष्ट्र उवाच
ततो द्वैरथमानीय़ फल्गुनं शक्रदत्तय़ा |  ४   क
न जघान वृषा कस्मात्तन्ममाचक्ष्व सञ्जय़ ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति