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भीष्म पर्व
अध्याय ११६
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सञ्जय़ उवाच
सन्धाय़ च शरं दीप्तमभिमन्त्र्य महाय़शाः |  २२   क
पर्जन्यास्त्रेण संय़ोज्य सर्वलोकस्य पश्यतः |  २२   ख
अविध्यत्पृथिवीं पार्थः पार्श्वे भीष्मस्य दक्षिणे ||  २२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति