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वन पर्व
अध्याय ८२
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पुलस्त्य उवाच
सकृन्नन्दां समासाद्य कृतात्मा भवति द्विजः |  १३८   क
सर्वपापविशुद्धात्मा शक्रलोकं च गच्छति ||  १३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति