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भीष्म पर्व
अध्याय ११६
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सञ्जय़ उवाच
दृष्टं दुर्योधनेदं ते यथा पार्थेन धीमता |  ३७   क
जलस्य धारा जनिता शीतस्यामृतगन्धिनः |  ३७   ख
एतस्य कर्ता लोकेऽस्मिन्नान्यः कश्चन विद्यते ||  ३७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति