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शान्ति पर्व
अध्याय २३२
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व्यास उवाच
वेदनार्ताः प्रजा दृष्ट्वा समलोष्टाश्मकाञ्चनः |  ३१   क
एतस्मिन्निरतो मार्गे विरमेन्न विमोहितः ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति