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कर्ण पर्व
अध्याय ४२
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सञ्जय़ उवाच
नैवान्तरिक्षं न दिशो नैव योधाः समन्ततः |  ३०   क
दृश्यन्ते वै महाराज शरैश्छन्नाः सहस्रशः ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति