आश्रमवासिक पर्व  अध्याय ४७

वैशम्पाय़न उवाच

पौरजानपदाश्चैव राजभक्तिपुरस्कृताः |  ११   क
गङ्गां प्रजग्मुरभितो वाससैकेन संवृताः ||  ११   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति