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द्रोण पर्व
अध्याय ११६
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सञ्जय़ उवाच
कृत्वा सुदुष्करं कर्म सैन्यमध्ये महावलः |  १८   क
तव दर्शनमन्विच्छन्पाण्डवाभ्येति सात्यकिः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति