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द्रोण पर्व
अध्याय ११६
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सञ्जय़ उवाच
जय़द्रथश्च हन्तव्यो लम्वते च दिवाकरः |  ३१   क
श्रान्तश्चैष महावाहुरल्पप्राणश्च साम्प्रतम् ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति