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द्रोण पर्व
अध्याय ११६
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सञ्जय़ उवाच
ग्रहणं धर्मराजस्य खगः श्येन इवामिषम् |  ३६   क
नित्यमाशंसते द्रोणः कच्चित्स्यात्कुशली नृपः ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति