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शान्ति पर्व
अध्याय १८०
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भृगुरु उवाच
यदा न रूपं न स्पर्शो नोष्मभावश्च पावके |  २१   क
तदा शान्ते शरीराग्नौ देहं त्यक्त्वा स नश्यति ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति