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आदि पर्व
अध्याय ११७
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वैशम्पाय़न उवाच
गन्धर्वनगराकारं तत्रैवान्तर्हितं पुनः |  ३३   क
ऋषिसिद्धगणं दृष्ट्वा विस्मय़ं ते परं यय़ुः ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति