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अनुशासन पर्व
अध्याय १११
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भीष्म उवाच
समारोपितशौचस्तु नित्यं भावसमन्वितः |  १४   क
केवलं गुणसम्पन्नः शुचिरेव नरः सदा ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति