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शान्ति पर्व
अध्याय ११७
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भीष्म उवाच
यथा मृगपतिर्नित्यं प्रकाङ्क्षति वनौकसः |  २१   क
तथैव स महाराज व्याघ्रः समभवत्तदा ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति