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शान्ति पर्व
अध्याय ११७
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भीष्म उवाच
तं दृष्ट्वा कुञ्जरं मत्तमाय़ान्तं मदगर्वितम् |  २४   क
व्याघ्रो हस्तिभय़ात्त्रस्तस्तमृषिं शरणं यय़ौ ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति