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शान्ति पर्व
अध्याय ११७
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भीष्म उवाच
दृष्ट्वा च सोऽनशत्सिंहो वन्यो भीसन्नवाग्वलः |  ३१   क
स चाश्रमेऽवसत्सिंहस्तस्मिन्नेव वने सुखी ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति