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शान्ति पर्व
अध्याय ११७
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भीष्म उवाच
तं मुनिः शरभं चक्रे वलोत्कटमरिन्दम |  ३५   क
ततः स शरभो वन्यो मुनेः शरभमग्रतः |  ३५   ख
दृष्ट्वा वलिनमत्युग्रं द्रुतं सम्प्राद्रवद्भय़ात् ||  ३५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति