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शल्य पर्व
अध्याय ६२
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वैशम्पाय़न उवाच
त्वां चैव नरशार्दूल गान्धारीं च यशस्विनीम् |  ५३   क
स शोचन्भरतश्रेष्ठ न शान्तिमधिगच्छति ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति