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शान्ति पर्व
अध्याय ३००
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याज्ञवल्क्य उवाच
एषोऽप्ययस्ते राजेन्द्र यथावत्परिभाषितः |  १७   क
अध्यात्ममधिभूतं च अधिदैवं च श्रूय़ताम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति