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वन पर्व
अध्याय १४१
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वैशम्पाय़न उवाच
सुवाहुश्चापि तान्दृष्ट्वा पूजय़ा प्रत्यगृह्णत |  २६   क
विषय़ान्ते कुणिन्दानामीश्वरः प्रीतिपूर्वकम् ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति