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वन पर्व
अध्याय ११७
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राम उवाच
ममापराधात्तैः क्षुद्रैर्हतस्त्वं तात वालिशैः |  १   क
कार्तवीर्यस्य दाय़ादैर्वने मृग इवेषुभिः ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति