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वन पर्व
अध्याय ११७
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अकृतव्रण उवाच
ततो यज्ञेन महता जामदग्न्यः प्रतापवान् |  ११   क
तर्पय़ामास देवेन्द्रमृत्विग्भ्यश्च महीं ददौ ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति