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वन पर्व
अध्याय ११७
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अकृतव्रण उवाच
वेदीं चाप्यददद्धैमीं कश्यपाय़ महात्मने |  १२   क
दशव्यामाय़तां कृत्वा नवोत्सेधां विशां पते ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति