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वन पर्व
अध्याय ११७
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अकृतव्रण उवाच
स प्रदाय़ महीं तस्मै कश्यपाय़ महात्मने |  १४   क
अस्मिन्महेन्द्रे शैलेन्द्रे वसत्यमितविक्रमः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति