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वन पर्व
अध्याय ११७
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अकृतव्रण उवाच
एवं वैरमभूत्तस्य क्षत्रिय़ैर्लोकवासिभिः |  १५   क
पृथिवी चापि विजिता रामेणामिततेजसा ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति