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वन पर्व
अध्याय ११७
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राम उवाच
धर्मज्ञस्य कथं तात वर्तमानस्य सत्पथे |  २   क
मृत्युरेवंविधो युक्तः सर्वभूतेष्वनागसः ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति