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वन पर्व
अध्याय ११७
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राम उवाच
किं नु ते तत्र वक्ष्यन्ति सचिवेषु सुहृत्सु च |  ४   क
अय़ुध्यमानं धर्मज्ञमेकं हत्वानपत्रपाः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति