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वन पर्व
अध्याय ११७
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अकृतव्रण उवाच
विलप्यैवं स करुणं वहु नानाविधं नृप |  ५   क
प्रेतकार्याणि सर्वाणि पितुश्चक्रे महातपाः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति