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वन पर्व
अध्याय ११७
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अकृतव्रण उवाच
त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवीं कृत्वा निःक्षत्रिय़ां प्रभुः |  ९   क
समन्तपञ्चके पञ्च चकार रुधिरह्रदान् ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति