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कर्ण पर्व
अध्याय १७
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सञ्जय़ उवाच
भग्नचक्रै रथैः केचिच्छिन्नध्वजपताकिभिः |  १०१   क
ससूतैर्हतसूतैश्च भग्नाक्षैश्चैव मारिष |  १०१   ख
ह्रिय़माणानपश्याम पाञ्चालानां रथव्रजान् ||  १०१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति