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भीष्म पर्व
अध्याय ११७
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सञ्जय़ उवाच
न च द्वेषोऽस्ति मे तात त्वय़ि सत्यं व्रवीमि ते |  १०   क
तेजोवधनिमित्तं तु परुषाण्यहमुक्तवान् ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति