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शान्ति पर्व
अध्याय १८७
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भीष्म उवाच
स्वभावसिद्ध्या संसिद्धान्स नित्यं सृजते गुणान् |  ४८   क
ऊर्णनाभिर्यथा स्रष्टा विज्ञेय़ास्तन्तुवद्गुणाः ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति