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भीष्म पर्व
अध्याय ११७
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सञ्जय़ उवाच
जानामि समरे वीर्यं शत्रुभिर्दुःसहं तव |  १२   क
व्रह्मण्यतां च शौर्यं च दाने च परमां गतिम् ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति