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भीष्म पर्व
अध्याय ११७
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सञ्जय़ उवाच
तथा च वलवान्राजा जरासन्धो दुरासदः |  १६   क
समरे समरश्लाघी त्वय़ा न सदृशोऽभवत् ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति