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भीष्म पर्व
अध्याय ११७
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कर्ण उवाच
दुरुक्तं विप्रतीपं वा संरम्भाच्चापलात्तथा |  २८   क
यन्मय़ापकृतं किञ्चित्तदनुक्षन्तुमर्हसि ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति