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भीष्म पर्व
अध्याय ११७
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सञ्जय़ उवाच
स ददर्श महात्मानं शरतल्पगतं तदा |  ३   क
जन्मशय़्यागतं देवं कार्त्तिकेय़मिव प्रभुम् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति