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भीष्म पर्व
अध्याय ११७
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सञ्जय़ उवाच
राधेय़ोऽहं कुरुश्रेष्ठ नित्यं चाष्किगतस्तव |  ५   क
द्वेष्योऽत्यन्तमनागाः सन्निति चैनमुवाच ह ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति