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द्रोण पर्व
अध्याय ११७
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सञ्जय़ उवाच
अद्य संय़मनीं याता मय़ा त्वं निहतो रणे |  १०   क
यथा रामानुजेनाजौ रावणिर्लक्ष्मणेन वै ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति