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द्रोण पर्व
अध्याय ११७
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सञ्जय़ उवाच
निर्भिदन्तौ हि गात्राणि विक्षरन्तौ च शोणितम् |  २७   क
व्यष्टम्भय़ेतामन्योन्यं प्राणद्यूताभिदेविनौ ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति