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द्रोण पर्व
अध्याय ११७
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सञ्जय़ उवाच
तावदीर्घेण कालेन व्रह्मलोकपुरस्कृतौ |  २९   क
जिगीषन्तौ परं स्थानमन्योन्यमभिजघ्नतुः ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति